विजयादशमी का अर्थ क्या केवल राम और रावण का युद्ध है? प्रत्येक पर्व एक बहती हुई नदी के समान होता है। उसके उद्गम पर कोई कथा होती है, पर आगे बढ़ते हुए वह अनेक धाराओं को अपने भीतर समेटता चलता है। विजयादशमी के साथ विडंबना यह हुई कि इस नदी को एक ही घाट पर बाँध दिया गया। जबकि "विजय" शब्द स्वयं एक प्रश्न बनकर खड़ा है: विजय किस पर, किसके द्वारा और किस साधन से?
- रावण के दस शीश दस विकारों के प्रतीक हैं, इसलिए पर्व का पहला संग्राम भीतर का है।
- बौद्ध-आंबेडकरवादी दृष्टि इसे धम्म-विजय और सामाजिक मुक्ति का पर्व मानती है।
- सर्वधर्म-समन्वय की दृष्टि इसे आत्म-विजय का साझा सूत्र मानती है।
- दोनों दृष्टियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं और दोनों की अपनी सीमाएँ हैं।
विषय-सूची
- दशमी का रहस्य: रावण के दस शीश
- बौद्ध-आंबेडकरवादी दृष्टि
- सर्वधर्म-समन्वय की दृष्टि
- तुलनात्मक समालोचना
- दहन किसका हो?
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस प्रश्न का उत्तर भारतीय चिंतन की दो प्रबल धाराओं ने अपने-अपने ढंग से दिया है। एक है बौद्ध-आंबेडकरवादी दृष्टि, दूसरी सर्वधर्म-समन्वय की दृष्टि। दोनों में सत्य का अंश है और दोनों की अपनी मर्यादाएँ हैं। यह लेख न किसी का अंधा समर्थन करता है, न अंधा विरोध। यह दोनों को एक ही तराज़ू पर रखकर तौलने का प्रयास है।
दशमी का रहस्य: रावण के दस शीश का दार्शनिक अर्थ
दस की संख्या भारतीय मनीषा में बार-बार लौटती है। पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ मिलकर दस द्वार बनाती हैं, जिनसे मनुष्य संसार को भीतर आने देता है और स्वयं संसार में बाहर जाता है। इन्हीं द्वारों पर पहरा न हो तो भीतर विकारों की सेना घुस आती है। रावण के दस शीश इसी का रूपक हैं: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, ईर्ष्या, छल और हिंसा।
यहाँ एक गूढ़ बात ध्यान देने योग्य है। रावण अज्ञानी नहीं था। वह वेदों का ज्ञाता, शास्त्रों का मर्मज्ञ और कला का पारखी माना गया है। फिर भी वह पराजित हुआ। कारण यह कि ज्ञान जब विनय से रहित हो जाता है, तो दीपक नहीं रहता, दावानल बन जाता है। यह शिक्षा किसी एक संप्रदाय की धरोहर नहीं, समूचे मानव-समाज की पूँजी है। प्रश्न यह नहीं कि रावण कौन था, प्रश्न यह है कि वह कहाँ-कहाँ हमारे भीतर साँस ले रहा है।
पहली दृष्टि: बौद्ध-आंबेडकरवादी धारा और धम्म-विजय
अशोक विजयादशमी: रक्त से धम्म तक
इस धारा की पहली स्मृति सम्राट अशोक की है। कलिंग की रणभूमि में बहे रक्त ने एक विजेता के हृदय को पराजित कर दिया। अशोक के तेरहवें शिलालेख में उस पश्चात्ताप की ध्वनि आज भी सुनाई देती है, जहाँ वह शस्त्र-विजय के स्थान पर धम्म-विजय को श्रेष्ठ घोषित करता है। परंपरा में इसी परिवर्तन को विजयादशमी से जोड़कर "अशोक विजयादशमी" कहा गया है। एक स्पष्टता आवश्यक है: इस तिथि-संबंध का आधार मुख्यतः परंपरा और श्रद्धा है, शिलालेखों में तिथि का सीधा प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे इतिहास का निर्णय नहीं, स्मृति की भावभूमि मानकर ही प्रस्तुत करना उचित होगा।
नागपुर की धम्म-दीक्षा: 14 अक्टूबर 1956
दूसरी और अधिक निर्णायक स्मृति 14 अक्टूबर 1956 की है। उस दिन विजयादशमी थी और नागपुर की भूमि पर बाबासाहेब आंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म की दीक्षा ली। यह केवल उपासना-पद्धति का परिवर्तन नहीं था। जिस समाज को सहस्रों वर्षों तक अपमान की सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर रखा गया, उसने उसी दिन उस सीढ़ी से उतरकर समता की समतल भूमि पर पाँव रखा। बाईस प्रतिज्ञाएँ इस परिवर्तन का घोषणापत्र हैं, जो कर्मकांड, जातिभेद और अंधविश्वास की बेड़ियों को काटने का संकल्प हैं।
इस दृष्टि का बल
इस धारा की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह विजय को सामाजिक न्याय से जोड़ती है। धम्मपद का भाव है कि संग्राम में सहस्रों को जीतने वाले से वह श्रेष्ठ है जो स्वयं को जीत ले। परंतु यहाँ आत्म-विजय एकांत की साधना बनकर नहीं रुकती। वह करुणा, समता और बंधुता की सामाजिक रचना का रूप ले लेती है। जिन्होंने पीढ़ियों तक पीड़ा झेली, उनके लिए विजयादशमी का अर्थ है अपमान की व्यवस्था का टूटना।
इस दृष्टि के सामने प्रश्न
निष्पक्ष समालोचना के लिए कुछ कठिन प्रश्न भी पूछने होंगे। यदि किसी धारा की पहचान केवल दूसरे के निषेध से बने, तो क्या वह अपनी मौलिक भूमि खो नहीं देती? रावण-दहन का विरोध यदि केवल प्रतिक्रिया बनकर रह जाए, तो वह धम्म की सृजनात्मक ऊर्जा को क्षीण कर सकता है। बुद्ध का मार्ग निषेध का नहीं, निर्माण का मार्ग है। साथ ही, स्मृति और इतिहास के बीच की रेखा धुँधली हो जाए तो सुदृढ़ तर्क भी दुर्बल पड़ जाता है। जो दृष्टि सत्य के नाम पर खड़ी है, उसे सत्य के प्रमाणों के प्रति सबसे अधिक सजग रहना चाहिए।
दूसरी दृष्टि: सर्वधर्म-समन्वय और आत्म-विजय
एक ही नदी, अनेक घाट
समन्वय की धारा का विश्वास है कि सत्य एक है और उस तक पहुँचने के पथ अनेक हैं। भीतर के शत्रु को सबसे बड़ा शत्रु मानने का सूत्र लगभग हर परंपरा में मिलता है। गीता कहती है कि मनुष्य स्वयं ही अपना बंधु है और स्वयं ही अपना शत्रु। जैन चिंतन में "जिन" वही है जिसने क्रोध, मान, माया और लोभ को जीत लिया। गुरु नानक का वचन है कि मन को जीत लिया तो जगत को जीत लिया। सूफ़ी संतों ने अपनी ही वृत्तियों से जूझने को सबसे बड़ा संग्राम कहा। ईसाई साधना ने प्रलोभन पर विजय और अंतःकरण की शुद्धि को आध्यात्मिक जीवन का सार माना।
इस दृष्टि का बल
इस दृष्टि की शोभा उसकी उदारता में है। वह पर्व को किसी संप्रदाय की चारदीवारी से निकालकर संपूर्ण मानवता का साझा आँगन बना देती है। जहाँ विभाजन की रेखाएँ गहरी हो रही हों, वहाँ यह दृष्टि सेतु का काम करती है।
इस दृष्टि की सीमा
किंतु उदारता जब सतही सहमति में बदल जाए तो संकट खड़ा होता है। यह कह देना बहुत सरल है कि सब धर्म एक ही बात कहते हैं। पर तब यह प्रश्न दब जाता है कि उन्हीं परंपराओं के छत्र तले समाज में ऊँच-नीच कैसे पलती रही। यदि उपदेश केवल भीतर के विकारों तक सिमटा रहे और बाहर के अन्याय पर मौन रहे, तो आत्म-विजय की भाषा व्यवस्था को ज्यों का त्यों बनाए रखने का सुंदर आवरण भी बन सकती है। परंपराओं के बीच वास्तविक मतभेद भी हैं। समन्वय का अर्थ भेदों को मिटाना नहीं, भेदों के बीच संवाद की भूमि रचना है।
तुलनात्मक समालोचना: दोनों दृष्टियों का मूल अंतर
प्रश्न की दिशा
समन्वय की धारा पूछती है कि मनुष्य के भीतर कौन-सा रावण बैठा है। आंबेडकरवादी धारा पूछती है कि समाज की संरचना में कौन-सा रावण जड़ें जमाए हुए है। पहली अंतःकरण की ओर देखती है, दूसरी संस्थाओं और संबंधों की ओर। एक के बिना दूसरी अधूरी है। जिसके हृदय में घृणा पल रही हो, वह समता का कानून रच भी ले तो उसे जी नहीं पाता। और जो केवल अपने भीतर की शांति में रमा रहे, वह दूसरों की पीड़ा के प्रति बधिर हो सकता है। एक भीतर का दीपक है, दूसरी बाहर की मशाल। अंधकार से लड़ने के लिए दोनों चाहिए।
कथा को पढ़ने का ढंग
परंपरागत पाठ में राम मर्यादा के प्रतिमान हैं और रावण का पराभव अधर्म की पराजय। आंबेडकरवादी चिंतन ने कथा को सत्ता के विमर्श के रूप में भी पढ़ा है और कुछ प्रसंगों, विशेषतः उत्तरकांड में शंबूक-वध पर, गंभीर नैतिक आपत्तियाँ उठाई हैं। इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है। अनेक अध्येता उत्तरकांड को परवर्ती जोड़ मानते हैं, और भक्ति-परंपरा ने राम को शबरी और निषादराज के प्रसंगों में करुणा के रूप में भी देखा है। निष्पक्ष समालोचना का तक़ाज़ा यही है कि कथा को न आँख मूँदकर पूजा जाए, न बिना पढ़े ठुकराया जाए।
साधन की पवित्रता
तीसरा बिंदु वह है जहाँ दोनों धाराएँ एक-दूसरे का हाथ थाम सकती हैं। अशोक और आंबेडकर, दोनों की विजय में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं। दोनों मानते हैं कि जो विजय पराजित के हृदय को न जीते, वह अधूरी है, और जो साधन अपवित्र हो, वह साध्य को भी कलुषित कर देता है।
दहन किसका हो? पुतले का या मानसिकता का
पुतला जलाना सरल है। उसमें बाँस, काग़ज़ और बारूद लगता है। कठिन है उस मानसिकता को जलाना जो मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा-बड़ा ठहराती है, उस घृणा को जलाना जो पड़ोसी की आँखों में शत्रु देखती है, और उस अहंकार को जलाना जो स्वयं को सदा सही और दूसरे को सदा दोषी मानता है।
यह पर्व शरद ऋतु में आता है, जब खेतों में फसलें पकती हैं और श्रम का फल घर लौटता है। इसी ऋतु में शस्त्र-पूजन की परंपरा भी है, जो रक्षा के दायित्व का स्मरण कराती है। श्रम और रक्षा, दोनों की प्रतिष्ठा इस पर्व में निहित है। इस दृष्टि से विजयादशमी किसी एक पक्ष की जीत का नहीं, सबके सम्मानपूर्ण जीवन के संकल्प का पर्व बन जाती है।
निष्कर्ष
यदि विजयादशमी को दो दृष्टियों के संवाद की तरह पढ़ा जाए, तो उसका अर्थ-क्षितिज और विस्तृत हो जाता है। समन्वय हमें विनम्र बनाता है कि हम दूसरों की परंपराओं में भी सत्य की झलक देखें। आंबेडकरवादी चेतना हमें सजग बनाती है कि मधुर शब्दों के पीछे कहीं अन्याय न छिपा रह जाए। पहली हमें आत्म-शुद्धि देती है, दूसरी सामाजिक साहस। मनुष्य को दोनों चाहिए: भीतर की निर्मलता भी और बाहर की निर्भीकता भी।
सच्ची विजयादशमी उस दिन होगी जब हमारे भीतर का अहंकार और हमारे समाज की ऊँच-नीच, दोनों एक साथ राख हो जाएँ, और उस राख से करुणा तथा समता का अंकुर फूटे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. विजयादशमी का वास्तविक अर्थ क्या है?
विजयादशमी का अर्थ केवल बाहरी शत्रु पर जीत नहीं, अपने भीतर के विकारों पर विजय है। रावण के दस शीश दस विकारों के प्रतीक माने जाते हैं।
प्रश्न 2. अशोक विजयादशमी किसे कहते हैं?
परंपरा में सम्राट अशोक के शस्त्र-विजय त्यागकर धम्म-विजय अपनाने की स्मृति को अशोक विजयादशमी कहा जाता है। इस तिथि-संबंध का आधार मुख्यतः परंपरा है, शिलालेखों में तिथि का सीधा प्रमाण नहीं मिलता।
प्रश्न 3. 14 अक्टूबर 1956 को क्या हुआ था?
उस दिन विजयादशमी थी और नागपुर में बाबासाहेब आंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली तथा बाईस प्रतिज्ञाएँ दिलाईं।
प्रश्न 4. क्या सब धर्म विजयादशमी के विषय में एक ही बात कहते हैं?
आत्म-विजय का सूत्र अनेक परंपराओं में मिलता है, परंतु उनके बीच वास्तविक मतभेद भी हैं। समन्वय का अर्थ भेदों को मिटाना नहीं, उनके बीच संवाद की भूमि रचना है।
संबंधित पठन
- इतिहास के और लेख पढ़ें: अशोक और प्राचीन भारत की पृष्ठभूमि के लिए।
- संविधान से जुड़े लेख: बाबासाहेब आंबेडकर के समता-दर्शन को समझने के लिए।
- सामान्य चर्चा के लेख: सामाजिक और वैचारिक विषयों पर और विमर्श।
लेखक: आरव सोलंकी, हिंदी लेखक एवं ब्लॉगर।
यह लेख आपको कैसा लगा? अपने विचार टिप्पणी में अवश्य लिखें और इसे उन मित्रों तक पहुँचाएँ जो पर्वों के गहरे अर्थ खोजते हैं। ऐसे और लेखों के लिए तथागत हेल्प से जुड़े रहें।
